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पार्टियों के आँगन में कलम हो रही है गुलज़ार।

                
                                                         
                            पार्टियों के आँगन में खिलने वाली कलम,
                                                                 
                            
लिखती है लड़कियों को पसंद है आजादी।
मर्यादा को लिखती है लड़कियों की बेड़ियाँ है,
ख़ुद के गुलज़ार के लिए लड़कियों को मोहरा बना रही है।
कलम करके भ्रमित सोच को ,
अपनों के खिलाफ भड़का रही है।
जो इंद्रियाँ लड़कियों की अपनी थी ,
कलम आँगन के लिए सजा रही है।
कलम ने दे दिया लिखकर तख्त ,
आजादी की आवाज़ बुलंद हो।
कलम ने हरम के महल को ,
आजादी का महल बना दिया।
जला कर लौ आजादी के महल का,
हरम की सेज़ फिर से सजाने लगी है।
गुलज़ार होगी अब यह सेज,
आजादी के पर्दे से ढककर।
होगा बदन आनंदित अब हरम की सेज़ पर,
बंडलों की नोटों से होंठों की लालिमा चमकेगी।
इसी को लिखकर आजादी कलम मुस्कुराती है,
पार्टियों के आँगन में कलम हो रही है गुलज़ार।
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2 घंटे पहले

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