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यह घटना अब न घटना रही है

                
                                                         
                            काल चक्र ने कुचल दिया,
                                                                 
                            
माँ के खिलते आँचल को।
दर्द भी पिघल गया ,
देख के इस मंजर को।
सत्य निकेतन की दुर्घटना को,
लगे हुए है कुछ नमूने,
वोट बैंक बनाने मे।
कब तक तुम सोते रहोगे,
कब तक शिकार बनते रहोगे।
यह घटना अब न घटना रही है,
बदल गई है सियासत में।
डूसू का तीर चल पड़ा है,
डूसू इलेक्शन रिझाने में।
तुम जब जिंदा थे,
माध्यम थे वोट बैंक का।
अब तुम जब मर गए हो,
तब भी तुम एक माध्यम हो।
आरोप प्रत्यारोप का,
सिलसिला चल पड़ा है।
दोष अब न दोष रहा,
हादसे में बदल गया है।
उन परिवारों का खिलता वंश,
ढह गया इमारतों संग।
जो सपना लेकर आए थे,
जर्जरता का बलि चढ़ गया।
संविधान कहता है ,
जनता ने सत्ता सौंपी है।
आम आदमी बन बैठा है,
राजनीति का ईंधन।
सम्मान सुरक्षा जवाब देही,
अब भाषण तक ही सीमित है।
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एक महीने पहले

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