दिन बैशाखी याद है,भरा था जलियाँ का मैदान
लोग ख़ुशी से झूम रहे थे,उसमें बच्चे भी थे नादान
रास न आई गोरों को खुशियाँ,आया एक दायर शैतान,
बरसी मासूमों पर गोली , फिर बाग़ हुआ श्मशान।
बच्चों के चिथड़े दीवारों पर,पेड़ पर लाशें झूल रही थी,
लाशों पर लाशे ढेर हुई,दायर की बंदूके गूँज रही थी ।
वर्षों बीत गए घटना को जख्म अभी भी भरे नहीं है,
देश की हर धड़कन में ज़िंदा मरने वाले मरे नहीं हैं
आज भी गवाही दे रहे दीवारों पर गोली के निशान
बरसी मासूमों पर गोली फिर बाग हुआ श्मशान।”
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