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मरीचिका: इस स्क्रीन का पाखंड

                
                                                         
                            सड़कें चौड़ी हो गईं, पर दिल तंग हो गए,
                                                                 
                            
तरक्की की इस दौड़ में, अपनों के पल खो गए।
हाथों में चमचमाती स्क्रीन तो है सबके पास,
मगर चेहरों से हंसी के वो पुराने रंग खो गए।

है आभासी दुनिया बड़ी, पर दिल में एक ख़ालीपन है,
इस दिखावे की चकाचौंध में, उदास हर एक मन है।
पास बैठे शख़्स से यहाँ, अब कोई वास्ता ही नहीं,
दूर के अजनबियों को रिझाने में, मस्त यह जीवन है।

बहुमंजिला इमारतों में सुकून ढूंढता है इंसान,
भूल गया है कि मिट्टी से ही थी उसकी पहचान।
मशीनें तो सब सीख गईं इंसानों की भाषा,
मगर इंसान ही भूल बैठा है अपनों के अहसान।

चलो बंद करें यह स्क्रीन, और ज़रा आँखें खोलें,
बनावटी मुस्कान छोड़, दिल की ज़ुबाँ में बोलें।
यह चमकता हुआ यथार्थ, महज़ एक छलावा है,
आओ मिलकर इस खोई हुई संवेदना को टटोलें।

- रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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