मौन बैठी है चेतना, और संवेदना का ह्रास है,
मखमली इस दौर में, हर श्वास ही उपहास है।
जो सड़कों पर ठिठुरते, भूख की परछाईं बन,
उन्हीं के रक्त से निर्मित, यह स्वर्ण-इतिहास है।
काँच के महलों में बैठे, न्याय के जो ठेकेदार हैं,
उनके न्याय के भीतर छिपा, केवल कतरन-लिबास है।
भीड़ तो दिखती बहुत है, इस प्रबुद्ध समाज में,
पर मनुष्यता को ढूँढता, मनुज खुद हताश है।
पूजते हैं पत्थरों को, जो नियम के नाम पर,
जिंदा तड़पती रूह का, करते वही उपवास है।
कलम की यह धार अब, विश्राम कैसे ले भला,
जब तलक इस पाखंड का, होता न पूर्ण विनाश है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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