कड़कड़-कड़कड़ वज्र कड़कता, दिग्दिगंत में काल गरजता।
रण-रंगणी में शंख धधकता, शोणित का महासिंधु भड़कता।
उठो वीर! अब खड्ग संभालो, काल-रात्रि का भाल प्रजालो।
चट-चट-चट-चट मुंड कटत हैं, धड़ से धड़ भीषण भिरत हैं।
फट-फट-फट-फट अंबर डोलत, वीर हुंकारी मुख से बोलत।
टंकारत धनु की प्रत्यंचा, थर-थर काँपत दुष्ट प्रपंचा।
रक्त-रंजित इस महामही पर, विजय-ध्वजा अपनी लहरालो।
उठो वीर! अब खड्ग संभालो, काल-रात्रि का भाल प्रजालो।
घहर-घहर घण-घोर घटा-सा, शत्रु-सैन्य पर वज्र जटा-सा।
छिद्र-छिद्र कर रिपु का सीना, वीर न सीखे कातर जीना।
भभक उठी स्वातंत्र्य-ज्वाला, पी ले अब तू रण का प्याला।
अरि-मुंडों की माल पिन्हाकर, भारती का यह कष्ट मिटालो।
उठो वीर! अब खड्ग संभालो, काल-रात्रि का भाल प्रजालो।
धधक-धधक उठी रण-वेदी, गूँज रही है गर्जन भेदी।
खण-खण-खण-खण खड्ग खनत है, काल स्वयं अब मुंड गिनत है।
थर-थर-थर-थर धरणी डोले, विकट कालिका मुखड़ा खोले।
रिपु-सेना के दर्प-दंभ को, धूलि माहि पल में मिलवालो।
उठो वीर! अब खड्ग संभालो, काल-रात्रि का भाल प्रजालो।
झंझावत-सा वेग तुम्हारा, काप उठे यह विश्व दुबारा।
भृकुटि तनी तो प्रलय मचेगा, शत्रु न कोई शेष बचेगा।
अचल सनातन धर्म-ध्वजा ले, महाकाल-सा शीश उठा ले।
रणचंडी के खप्पर भर कर, शौर्य-कीर्ति का दीप जलालो।
उठो वीर! अब खड्ग संभालो, काल-रात्रि का भाल प्रजालो
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X