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एकाकीपन

                
                                                         
                            मैं नहीं कर पाया किसी को डेट,
                                                                 
                            
क्योंकि लाइफ ही नहीं हुई सेट।

नहीं देखे मैंने किसी के नखरे,
ना किसी का बंधा बन, ना बाल बिखरे।

उसके मुस्कराने को मैंने बस कल्पना में देखा,
कल्पना में ही मदहोश हुआ, कल्पना में ही बहका।

कुछ ना देखकर भी मैंने वो सब कुछ देखा,
मेरे समझ के बाहर है ये नियति का लेखा।

आख़िर कोई कितना इंतजार करे,
उस ऊपरवाले की निर्मित जोड़ी को बिना देखे कोई कितना प्यार करे।

कोई कहेगा अभी देर नहीं हुई, वो मुलाकात भी होगी,
बेशक होगी, मगर, तब वो बात नहीं होगी..

वही दिन होगा, वही रात होगी,
कुछ नहीं होगा तो वो बात नहीं होगी।

एक दौर होता है किसी के आने का, किसी के जाने का,
किसी के मिलने का, किसी के बिछड़ने का।

क्या अपनी सारी जिंदगी उस दौर की आस में लगा दूं,
या भोग विलास से दूर खुद की तलाश में लगा दूं।

जो हो रहा है, वो होने दो,
मुझे मेरी तन्हाई के साथ अकेला रहने दो।
- रोहित शर्मा 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

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