सावन पंछियों के गुनगुनाने का इंतज़ार करता रहा,
और मैं गुनगुन के आने का
और हुआ है जब से नशा उसका
भूल गया हु पता मयख़ाने का I
अब आँखों में गुनगुन का प्रतिबिंब रह गया,
उससे ज़िक्र का जहन में स्वप्न रह गया।
सोचा था हमारा प्रेम-संगम,
मगर उसके नाम पर दोस्तों का आलिंगन रह गया।
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