आधी रात
आधी रात,
उल्लुओं की निकली बारात।
कौवे चुप हैं,
कोयल गुम है।
चाँद बादलों में
मुँह ढककर सोया हुआ है,
मानो हमसे कह रहा है—
आधी रात का समय हो रहा है।
पर मैं तो जागा हुआ हूँ,
टहल रहा हूँ,
पूछ रहा हूँ—
कैसा उल्लू?
कैसा कौवा?
किसका चाँद?
किसकी बारात?
कैसी आधी रात?
बोलो,
क्यों करते हो बात?
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