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मेरा पहला प्यार

                
                                                         
                            मेरा पहला प्यार
                                                                 
                            

तेरी जिस्म से ज्यादा तेरी रुह को चाहता हूं
मै इश्क नहीं पर बेवफ़ाई से डरता हूं

हर कोई ढूंढ़ लेता है अपनों को अपनी दुनिया में
मै तो तुम्हे अब अपने सपनों में ढूंढ़ता हूं

तुम कोई चांद नहीं जो बादलों में छिप जाओगी
तभी तो हर रोज तेरी गलियों से गुजरता हूं

कहीं दिख जाए तेरी पांव के निशान इन गलियों में
जिसे तुम्हारी तस्वीर समझ कर छूना चाहता हूं

पहले मुझे आदत थी बेपरवाह समंदर में तैरने की
अब तो झील के पास भी जाने से डरता हूं

कहीं डूब न जाए ये ज़िन्दगी कंकड़ों की तरह उनमें
जिनके खातिर हर रोज किनारों पे आके बैठता हूं

मुझे प्यार हर दिन किसी अजनबी से हो जाता है
पर इज़हार तुम्हीं से मिलकर करता हूं

मै कभी जुदाई से नहीं डरता इश्क के सफर में
मै तो लड़कियों की सिर्फ बेवफ़ाई से डरता हूं

बहुत दर्द होता है तू जो वादा कर के नहीं आती मिलने
तेरे इंतज़ार में सारा दिन प्यासा ही रह जाता हूं

अब तो आदत सी हो गई है तुमसे बिछड़कर जीने की
तभी तो आंसुओं को शराब समझकर पी लेता हूं

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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