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ये व्यर्थ है...

                
                                                         
                            पुज लिया मैं मूरत को
                                                                 
                            
पर स्त्री को न पूज सका
बिटिया को रानी बनाकर
बहुओं की न सुन सका

की रोक रखा सड़कों पर उनको
ढूंढा जाकर घर घर जिनको
ये नौ दिन की निष्ठा का क्या अर्थ रहा
स्त्रियां बंधी है तो सब व्यर्थ रहा

थोड़ा सही तो मैं भी हूं
कपड़ों पर बाधित मै भी हूं
संस्कारों में कमी तो आई है
उस कमी का कारण मै भी हूं

माना तुम देवी ही हो
पर दुष्टों पर क्यों वार नहीं
बिना लड़े तो तुमने माना
ये जीत तुम्हारी हार नहीं
रावण तो हर घर हर युग में हैं
लगता पढ़ा गीता सार नहीं
-रितेश
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एक घंटा पहले

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