मुझे याद है,
इलेवंथ की एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में
जब सैकड़ों लोगों की नज़रें मुझ पर थीं,
कुछ ही पंक्तियाँ बोलने के बाद
मेरी आवाज़ थम-सी गई थी।
नतीजा यह हुआ कि मुझे
अपना भाषण बीच में ही छोड़कर जाना पड़ा।
यह प्रतियोगिता मेरे स्कूल का कोई साधारण कार्यक्रम नहीं,
बल्कि एक जिला स्तरीय मंच था,
जहाँ दर्जनों स्कूलों से चयनित प्रतिभागी आए थे।
इससे पहले मैं स्कूल के लगभग
हर कार्यक्रम में भाग लेता रहा था,
लेकिन उस दिन ऐसा लगा
मानो मंच ने मुझे यह कहकर नकार दिया हो—
कि तुम अभी तैयार नहीं हो,
तुम्हें खुद को और तराशने की ज़रूरत है।
– ऋषभ भट्ट
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