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सुमिरन प्रभु

                
                                                         
                            करो उपकार अपना है सुमिरन प्रभु,
                                                                 
                            
तुम गुणों के धनी हम हैं निर्धन प्रभु,
मिले आधार कदमों को मेरे तेरी,
मिट गये सारे पल भर में अर्चन प्रभु,

करो उपकार अपना है सुमिरन प्रभु,
तुम गुणों के धनी हम हैं निर्धन प्रभु।

पाप की मोतियों को गिराकर सभी,
पुण्य की मिश्रियों को हम खाने चले,
गणपति हम सजा करके पंडाल को,
तेरे आने की खुशियां मनाने चले,

धूप सी महकी है घर और गली,
आके चंदन पवन में विराजे स्वयं,
उनके तन पे मैं हल्दी लगाने चलूं,
प्रेम के जो वसन पीत साजे स्वयं,

दिन बचे जिंदगी के आज मंगल हुएं,
सांसों को कर्ज तूने ये भारी दिया,
हो उठाते स्वयं भार सृष्टि का इस,
मेरे हाथों की प्रतिमा भी हल्का किया,

करो उपकार अपना है सुमिरन प्रभु,
तुम गुणों के धनी हम हैं निर्धन प्रभु,
मिले आधार कदमों को मेरे तेरी,
मिट गये सारे पल भर में अर्चन प्रभु,

करो उपकार अपना है सुमिरन प्रभु,
तुम गुणों के धनी हम हैं निर्धन प्रभु।

– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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