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सफर मिल जाए कि मुझको आज

                
                                                         
                            चल कदम लम्हों–लम्हों पर सांस बचाए रखता हूँ,
                                                                 
                            
तू आ न जाए कही से लौट,
तेरी एक आवाज को सुन, जिंदगी के हर मुकाम छोड़,
आ जाऊंगा वहीं से लौट,
कि जब यही है मंजूर जान–ए–करार तुझको,
मेरी तड़पन, मेरे आजार,
तेरा दिया हुआ सब कुछ सह लूंगा, तेरी तमन्नाओं से
निकली, आहें भी हज़ार,
किसी ने कहा बिल्कुल सही, धूप से साए नहीं डरते,
धूप के बिना अंधेरे नहीं मरते,
मुनासिब है तेरा अपनी पसंद के साथ ज़िंदगी जीना,
हम भी जिएंगे उम्मीद करते,

मेरी जागी हुई नींदों का न पूछने आना कभी हाल,
मेरी तमन्नाओं के ख्वाबीदा परवाज़,
मेरी नींदों को ठहर मिल जाए, बसर मिल जाए,
एक सफर मिल जाए कि मुझको आज।

– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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