तुम गीत रागिनी में रमती,
तुम चन्द्र रश्मि से प्यारी,
तेरे चरण पुष्प मृदु लागे,
हो नवनीत स्वयं बलिहारी।
तुम रति प्रिय श्री लाली,
तुम प्रेम पुष्प की डाली,
फिरें तीन लोक के स्वामी,
जिनके पीछे बन वनमाली।
तुम प्रभा पूर्ण श्री राधे,
तुम रुचिर रूप से आगे,
तेरी एक दरस पाने को,
हर सावन बरखा भागे।
तुम बरसाने के रज–रज में,
तुम उर–उर की ठकुरनी,
श्री रम्य रूप यह तेरी,
रवि किरणों से बखानी।
तुम छवि मनोहर उर साजै,
तुम रूप, रम्य आ विराजै,
तुम अर्ध कृष्ण हो राधे,
हे कृष्णमयी, तेरी जय–जय।
– ऋषभ भट्ट
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