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मुट्ठियां

                
                                                         
                            मुठ्ठी भर साँस
                                                                 
                            
मुट्ठियां ही दुबकाए
जूझती सी लपटों से
यह निठुर पल बीत जाए
ये अग्नि का मर्दन
वज्र सा उर को भेदता
सजल हो
प्रलय का यह पल बीत जाए

नभ गर्जना छेड़े
तड़ित कर आगाज
मेघ बरस उठो

झुलसे नरों की तप्त अस्थियां
श्रान्त हो–हो बची सी
देखती मनु–पुत्र हमीं को।

यह दुर्निवार अग्निकुंड!
दहकता–दहकता
निस्सीम रूप ले, चला छूने

करो को, पर ज्यों
छू न सका
लगा दहकने

धुंध था या अवसाद मेघमयी?
बिन मयंक निशा बिखेरती

हत्यारी धुंध
धूं-धूं कर लेती रही प्राण

दे हृदय पर कंटक
यह गहन रात्रि थी, दिन नहीं
यह अमा, तिमिर या कालिमा ही थी
कि कोई अग्नि का उत्कर्ष नहीं।

– ऋषभ भट्ट
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3 महीने पहले

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