कोई हकीम हो तुम
या मुझमें लगी कोई बीमारी है,
आधा इश्क मेरा है
आधे में तुम्हारी हकदारी है,
वश में ऐसे किया
कि खिलकर भी, मुरझाकर भी,
तुम्हारा ही रहा,
गर्मी ठंडी मौसम बदले,
मगर मेरे लफ्जों वही रहे,
जो तुमने कहा।
ये वशीकरण समझा दो मुझे,
इन ठहराओं से निकल जाऊं,
तुम सच्चाई से इश्क नहीं कर सकती,
तो मैं झूठे गुण ही क्यों गाऊं?
कल शाम आओगी तुमने ही कहा था,
हां वो जाना बहाना हुआ,
हर शाम चाय लेकर बैठता हूं,
अभी तक कहां तेरा आना हुआ!
यही सोचते हुए हमेशा की तरह,
आज भी मैं,
चाय की ठंडी कप पी गया,
अच्छा हुआ मेरे साथ मरने के बजाय,
तू अपनी मोहब्बत किसी और के संग जी गया।
– ऋषभ भट्ट
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