छत से उतारूं तुमको सांझ सवेरे जैसे,
जुगनू इस दिल को बहलाती अंधेरे ऐसे,
जाने कब बन बैठीं बचपन की यादें जवानियां,
पानी से कह दूं मैं बारिश तुम्हारी हो,
बादल में तारे जितने हक में खुमारी हो,
लिख जा तू मुझमें स्याही बनके, हों कहानियां,
ऐ चंदा–तारे सुन लो,
इक–इक कर सारे सुन लो,
मैं फिरता हूँ आजकल जैसे,
मौसम की खोई फिराक में...
मुझमें अंगड़ाई बनके,
सुबह वो आई बनके,
मैं मिलता हूँ आजकल उससे,
मौसम की खोई फिराक में...
नदियां के धारों को जैसे बादल उछाले,
कानों में गूंजे धुन बस शहनाई वाले,
रेतीली धरती पे दिल की कश्ती की ठहरी वादियां,
भौंहों को तेरी छुके गुजरे जितनी हवाएं,
सांसे वो मेरी बनके हर लें बलाएं,
मेरी दुआओं के बदले चुकता हों तेरी गुस्ताखियां,
ऐ किस्से–कहानी सुन लो,
इस दिल की नादानी सुन लो,
मैं लिखता हूँ घड़ियां उलझी,
मौसम की खोई फिराक में...
रिश्ते को दिल के डोरी कह ले,
वो चाहे तो चोरी कह ले,
मैं करता हूँ आजकल कुछ भी,
मौसम की खोई फिराक में...
– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X