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गुंजाइशें भली न थीं तेरे आने की

                
                                                         
                            गुंजाइशें भली न थीं तेरे आने की,
                                                                 
                            
दिल की आवाजें धीमी पड़ गईं तुझे बुलाने की,

बेअदब किरदारों ने मुझे बेवफा कह पुकारा,
तूने कोई कसर न छोड़ी बदचलन कहलाने की,

चल बराबर है तेरा और मेरा हिसाब अब,
कोई जरूरत नहीं अपने कारनामों के ब्याज दिखने की,

दरअसल वो दौर तुम्हारा ही था, मेरा नहीं,
बेफ़जूल ज़िद कर रखी थी तूने बाज़ी लगाने की,

तमाशगीन कसूरवार नहीं होते किसी मसले के,
के तमाशा ही बनाती है ज़िद मदारी दिखने की,

समंदर के पानी में चीनी ही मिलाना होता है जब,
न जाने क्यूं कतराते हैं लोग फरमाइशों पे शरबत पिलाने की?

झूठ के आंसू न बहा महबूब मेरे,
कोशिश मैंने भी की थी आंखों पे प्याज़ लगाने की,

मोहब्बत बस धोखा है चालसाजी का,
कोई किस्सा शुरू न होगा अब तेरी याद आने की।

– ऋषभ भट्ट
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3 महीने पहले

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