हर गिनती जा ठहरी, जैसे ही सौ आया,
एक राम लिखा उर ने लगता है ब्रह्मांड कमाया,
पैरों के बढ़ने से अब, जैसे बढ़ती रजाई है,
क्या डरना दरिया से सौ पार किया मैंने खाई हैं।
– ऋषभ भट्ट
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