मेरे तृषित अधर को पग–पग मिलती घूंट,
छोडूं यदि संघर्ष को मुझसे जाए छूट,
दूर गगन का तारा एक, नित आए अक्षर बन,
स्वप्निल उस संदेश को कि पढ़ ले जाए मेरा कर,
मैं विजयानल को जीने वाला, सागर मेरी भूख,
ठहरा यदि गिर जाऊंगा, तन जाएगी सूख,
हे अचर–चराचर, हे विधना! ब्रह्मा, विष्णु, महेश,
इस सृष्टि में रह जाए कि मेरा भी अवशेष,
मैं मनुज साहसी सिंहनी से रास रचाने वाला,
मुझको क्या पिघलाएगी तृण जैसी मृदु बाला?
हे मनसिज तुम भी रख लो, मुझसे दूर तूणीर,
टकराकर वक्ष से मेरे, हो जाएगा खंडित तीर,
मैं, मैं नहीं, अहंकार का कोई तुच्छ पुजारी,
युद्ध मेरी नीति है, युक्ति मेरे दरबारी,
नहीं धर्म का ज्ञाता पर श्वेत–श्याम तो दिखता है,
स्वप्न उसके क्या भाप बनेंगे जो खुले नेत्र से लिखता है,
बाध्य नहीं साधक हूँ विधना, तप मेरे हैं घूंट,
छोडूं यदि संघर्ष को प्राण जाए फिर छूट।
– ऋषभ भट्ट
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