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बिगड़ी संवार दो

                
                                                         
                            थामके यमुना का आंचल
                                                                 
                            
तेरे द्वार को
मैं चला, अब ज़िंदगी को
तुम ही निखार दो
भक्त मैं प्रभु, बस प्रार्थना करूं
तुम निराकार, मुझको आकार दो

हे त्रिलोक के रचयिता बिगड़ी संवार दो,
नैन से अपने पल–भर मुझको निहार दो।

कुरुक्षेत्र में, रण धर्म की
निशस्त्र हो किए
पार्थ के, बन सारथी
सूरत बदल दिए
एक है आसरा, तेरा मशवरा
मुश्किल घड़ी में आँगन मेरे पधार दो

हे त्रिलोक के रचयिता बिगड़ी संवार दो,
नैन से अपने पल–भर मुझको निहार दो।

पहले तुमसे, ‘राधिका’
मन में वरण करूं
फूल ले, उनके चरण से
तेरे धरूं
तुम हो प्रिये, वो हृदय प्रिया
पवन छवि ये मेरे दिल में उतार दो,

हे त्रिलोक के रचयिता बिगड़ी संवार दो,
नैन से अपने पल–भर मुझको निहार दो।

– ऋषभ भट्ट
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एक घंटा पहले

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