छूटा हुआ पहाड़
छोड़ आया घर-बार, अपना प्यारा पहाड़,
अपनों की धरती, अपना लोक-समाज।
रोज़ यादों में लौट आते हैं वे सुनहरे दिन,
बाँज-बुरांश से महकता वह हरा-भरा चमन।
वनों की छाँव में बीता बचपन,
आज भी मन में बसते हैं वे पल।
क्यों न याद आएँ वे सुनहरे दिन,
जिनमें बसती थी जीवन की हर धुन।
गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू,
झरनों की मधुर कल-कल तान।
संस्कृति के गीत, अपनों का अपनापन,
यही तो थी मेरे जीवन की पहचान।
पगडंडियाँ आज भी मुझे पुकारती हैं,
देवदार की शाखें राह निहारती हैं।
दूर शहरों की चकाचौंध में भी,
मन मेरा पहाड़ों में ही विचरता है।
जहाँ हर साँझ सुकून बिखेरती थी,
हर सुबह नई उम्मीद जगाती थी।
वहीं बसते हैं मेरे प्राण, वहीं मेरा सम्मान,
मेरा उत्तराखंड ही मेरी सबसे बड़ी शान।
चाहे कितनी भी दूर चला जाऊँ,
उस माटी का ऋण कभी चुका न पाऊँ।
जब तक साँसें मेरा साथ निभाएँगी,
पहाड़ की यादें दिल में सदा मुस्कुराएँगी।
सधन्यवाद।
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