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ऊंचे सपने

                
                                                         
                            आसमान के चेहरे पर, एक नाम अपना भी होगा।
                                                                 
                            
जो ख्वाबों में देखा हमने, वो पूरा सपना होगा।

माना दूर बहुत है मंजिल, मुश्किल है आसान नही।
कोशिश है, संघर्ष है जारी, ज़िद है पर अभिमान नही।

अकड़ तोड़ने मंजिल की,हम मांझी बन निकले हैं।
शहर शहर और गली गली में, पंछी बन हम चहके है।

नामों से जिन्हें नाम मिला ,हम बेनामों के साए हैं।
नाम मिला खैरात में उनको,हम कोशिश से छाए हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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