आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मां की ख्वाहिशें खवाई

                
                                                         
                            मेरी मां हर रोज जुगाड लगाती है
                                                                 
                            
तब जाकर घर की दीवार बनाती है
हर साल बारिशों में टूट जाता है घर
मेरी मा हर साल वहीं घर पूजा का द्वार बनाती है

सोचती हैं कब मेहरबा मेरा रब होगा
जो हर साल बारिशों में न टूटे, ऐसा कब मेरा घर होगा
इंतजार की भी हद होती होगी
ये हद जब टूटेगी,ऐसा कौन सा पल होगा

जमाने बीत गए, बहाने भी छूट गए
गांव के घर सारे ,पुराने भी टूट गए
मेरी मां अपने लिए कुछ नहीं चाहती
फिर भी जाने क्यों उनके सारे सपने ही रूठ गए
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर