मेरी मां हर रोज जुगाड लगाती है
तब जाकर घर की दीवार बनाती है
हर साल बारिशों में टूट जाता है घर
मेरी मा हर साल वहीं घर पूजा का द्वार बनाती है
सोचती हैं कब मेहरबा मेरा रब होगा
जो हर साल बारिशों में न टूटे, ऐसा कब मेरा घर होगा
इंतजार की भी हद होती होगी
ये हद जब टूटेगी,ऐसा कौन सा पल होगा
जमाने बीत गए, बहाने भी छूट गए
गांव के घर सारे ,पुराने भी टूट गए
मेरी मां अपने लिए कुछ नहीं चाहती
फिर भी जाने क्यों उनके सारे सपने ही रूठ गए
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