हार रहें हैं हर पल हम,कहीं उम्मीदें दिखती ना।
भटक रहें हैं राहों पर,पर कहीं रोशनी मिलती ना।
आशाओं का बांध पुलिंदा,हर गली ठिकाने ढूंढ़ रहें।
हर बाजी पर मात मिली,जीत कहीं भी दिखती ना।
हार रहें हैं हर पल हम ..........................
भटक रहें हैं राहों पर ............................
सीढ़ी इतनी लंबी है,कि चढ़ चढ़ कर हम हार रहे।
वापस उतरे गर वसुधा पर,तो शान मात की होगी ना।
हार रहें हैं हर पल हम ............................
भटक रहें हैं राहों पर .............................
ज़ख्मों पर ज़ख्म बनाए हैं,हमने भी ख्वाब सजाए हैं।
सब ज़ख्म भरेंगे एक न एक दिन,बिन मेहनत मंजिल मिलती ना।
हार रहें हैं हर पल हम ........................
भटक रहें हैं राहों पर ..........................
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