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माँ से दूर जाने के एहसास में मैं तब तड़प उठी थी

                
                                                         
                            माँ से दूर जाने के एहसास में मैं तब तड़प उठी थी,
                                                                 
                            
जब मेरे हाथों में मेहंदी और माँग में लाल सिंदूर सजी थी ।
फिर विदाई हुई, मेरी डोली उठ रही थी।
चीत्कार निकली मेरी , मेरी माँ रो रही थी।
गमगीन थे परिजन, आँसू बहा रहे थे,
मगर पिया के आँगन में सब खुशियाँ मना रहे थे।
माँ से दूर जाने का बस यह एक एहसास था,
प्यार कभी न कम हुआ, दिल में यह विश्वास था।
आज एक बार दिल फिर ज़ोरों से धड़क रहा है।
माँ हम सबसे दूर हुई, दिल तड़प रहा है।
माँ की अर्थी सजी हुई थी, सभी आँसू बहा रहे थे।
कोई ढाढ़स दे रहा था, कोई गले लगा रहा था।
सबने बस सिर्फ यही कहा, "माँ का साथ बस यहीं तक था।"
सबने बस सिर्फ यही समझाया, "किस्मत को यही मंज़ूर था।"
माँ का प्यार अब छूट गया, यादें दिलों में रह गईं।
यादों के सहारे जीने लगे हम, माँ की ममता छूट गई।
दूर गई माँ इस जहाँ को छोड़कर, हम सब रोते-बिलखते रहे।
कहाँ गई माँ, तू हमें छोड़कर? हम सब तेरे लिए तड़पते रहे।
आ जाओ, माँ, बस एक बार, तू हमको गले लगा लेना।
कहाँ गई तू हमें छोड़कर? बस इतना तू बता देना।
आ जा, माँ... आ जा, माँ...
एक बार बस आ जा, माँ।
मुझको गले लगा ले, माँ,
बस एक बार तू आ जा, माँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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