देखो कहीं अपना पुराना चित्र
याद करो बचपन का मित्र
खेल कूद मस्ती का पल
खुद को समझते थे खुब प्रबल।
जब जगी यौवन की आग
जीवन के कुछ झरे पराग
उदासीन औ’ याद विलास
जीवन के अब गए उल्लास।
कैसी थी वह नगर-परिवेश
एक कथा जवानी के शेष।
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