अब रोना ही है निश्चय
पूछो इस भारत के भू से
कितने इनको संतान मरे हैं।
बिन बोले ही जनता प्यारे
अपना लहू दान करे हैं।
देकर निज प्राण वीर
कितने यहां जवान तरे हैं।
बापू के लाठी से पूछो
कितने वे ठुंकार भरे हैं।
सुभद्रा के कविता से पूछो
कितने वे हुंकार भर हैं।
मिट जायेंगे सब कुछ यदि
तो साक्ष्य भरेंगे समय।
अब रोना ही है निश्चय।
कोकिला गाती थी मन मरे
उनकी भी तो राग गए हैं।
हंसती थी कलियां बेचारी
उनके भी पराग गए हैं।
पूछना उन अवला से जाकर
जिनके रण में सोहाग गए हैं,
महान चरितार्थ के ऊपर
वायस-सा काला दाग लगे हैं।
विलकती ऊटज में मां का
स्वप्न से भरा अनुराग गए हैं।
सजनी के आशाओं के न
जाने,मर गए अनादि प्रणय।
अब रोना ही है निश्चय।
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