आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

युद्ध दुर्योधन का

                
                                                         
                            आतंक के इस यज्ञ में चढ़ी है आज एक बलि और,
                                                                 
                            
कितनो के अपने खो गए है, छूट कितनो के गए ठौर,
धर्म के नाम पर अधर्म का आया है ऐसा दौर,
जल की उज्जवल धारा में भी रक्त रहा है अपने किसी का दौड़,
धर्मनिरपेक्ष धूप में उपजी रोटी के भी हिंदू मुस्लिम में बट रहे है कौर,
तोड़ दो ये मस्जिद, छोड़ दो शिवालय,
खड़ा कर दो वहां कोई विद्यालय, अनाथालय या की पुस्तकालय,
साथ में उन्नति करेंगे दुनिया रखेगी याद,
क्या रखा है अंधे हिंदुत्व में नहीं चाहिए लव जेहाद,
नही मिटा सकते देश की सीमाएं तो चलो फिर उसको यूंही रहने दो,
पर बाटो तो न सांसों को,आंधी दहशत की न बहने दो,
हे मनु की संतान तुम इंसान को इंसान से इतना खफा तो न रहने दो,
मिलकर बढ़ो नए कीर्तिमान बनाओ,
यूं रोज खुदा के नाम पर,
युद्ध दुर्योधन का रहने दो,
इस महाभारत को देकर विराम,
श्वास हर परीक्षित को लेने दो,
तुम युद्ध दुर्योधन का रहने दो।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर