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पिता का वजूद

                
                                                         
                            पिता का वजूद
                                                                 
                            

मुंडेर पर बैठी गौरैया
पुकारती रही पिता को
आज तो दाना भी नहीं चुगा
पानी का कसोरा भी भरा हैं
गिलहरी की पनियाली आँखें
सुना रही एक अलग दास्तां
माँ की सूनी कलाइयाँ
और वीरान आँखों में खालीपन
घर की दीवारों की बेचैनी
आँगन भी आज खामोश है
नहीं सुनाई दे रही
पिता की चहलकदमी
अखबार भी आँगन में पड़ा है
सुतली से बँधा हुआ
बरामदे में पड़ी रॉकिंग कुर्सी
आज बेज़ान सी हो गई

पिता के जाने के बाद
चरमरा गया घर का कायदा
कर्पूर की माफि़क उड़ा मेरे
बेवक्त घर लौटने का डर
बावजूद इन सबके
पिता की खुरदरी हथेलियों का स्पर्श
महसूस होता हैं कांधे पर
उनकी रौबदार आवाज़ की गूँज
दौड़ती है मेरे अवचेतन में
उनके उसूलों का रक्त
व्याप्त है मेरी धमनियों में
जो बचाए रखता है आज भी
पिता का घर में न होकर
मेरे अंदर पिता का वजूद होना
- रेखा मित्तल
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3 महीने पहले

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