व्यथा थी मेरे मन की इतनी,
जिस कुल में पैदा हुई, वो कुल पराया,
पराया मैंने कुल अपनाया।
सुनती हूँ रोज़ वहाँ भी—
“पराए घर की है ये बेटी।”
अब तो दिल-दिमाग ये कहता,
अगर आशियाना तेरा होता,
अपना तेरा ज़माना होता।
अक्सर मेरी बेटी पूछे—
“माँ, रहती हो खामोश कैसे?
क्या तुममें मैं अपने कल का
दर्पण देखूँ?”
खुद को अगर मैं ऐसे सोचूँ,
बन जाऊँ अबला नारी,
है दुखी बड़ी बेचारी।
माँ, करो इतना, कदम बढ़ाओ,
अपने लक्ष्य को अपनाओ।
देख तुम्हें, मैं भी सपनों की
उड़ान भरूँ,
अपने जीवन का स्वयं उद्धार करूँ।
माँ, मैं तेरा जगत में
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