आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परछाइयों से आगे भी कभी...

                
                                                         
                            परछाइयों से आगे भी कभी निकलना सीखो
                                                                 
                            
ज्वाला की तरह प्रच्छन्न होकर मचलना सीखो
सरजमीं की खिदमत में न्यौछावर जो हुए
उनके किरदारों से जीवन में संभलना सीखो
है आसमां लुभाता तो ख्वाबों को संवारो
उड़ानों को पा लो जमीं से जुडे रहना सीखो
सौगात में पाया है उसे ठुकरा ना देना कभी
वेद मंत्र शाश्वत है उन्हें संस्कार बनाना सीखो
ज्ञान का भंडार लिए बैठें है जो आसपास
उनके सानिध्य में रहकर खुद को आजमाना सीखो
हम सब की बागडोर संभाले हुआ है जो
उस परमात्मा को आत्मा से मिलाना सीखो
होती है दिक्कत ज़रूर मगर हौसला रखो
ध्येय की तरफ बढ़ते हुए विश्वास जगाना सीखो
-कवि 'रवि'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर