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शायद अगली संविदा पर

                
                                                         
                            अगली संविदा
                                                                 
                            

वह!
चलता रहा, दौड़ता रहा
ज़िन्दगी की भागम भाग में
पसीने में लथपथ रहा
कन्धों पर ज़िम्मेवारियाँ
पीठ पर बोझ बढ़ता रहा ...

शाम ढलती रही
दिन निकलता रहा
पल पल सोचता रहा
विश्वास पलता रहा
उम्मीदों के पंख
फ़ड़फ़ड़ाते रहे ...

एक दिन आएगा
सब ठीक हो जाएगा
इंतज़ार करता रहा ...

दिन गुज़रा साल गुज़रे
एक दिन गुज़र गया...
बताने फिर कभी नहीं आया...
सब ठीक हो गया?

वह संविदा कर्मी था
शायद अगली संविदा पर
कूच कर गया...

~ रवीन्द्र कुमार मिश्र
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एक महीने पहले

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