आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आकृति..

                
                                                         
                            कोई रूप सरल लगता, कोई गहरा सागर है,
                                                                 
                            
किसी आकृति में धूप बसी, किसी में पूरा भँवर है।

किसी चेहरे पर सुबह खिली, किसी पर साँझ उतरती है,
किसी निगाह में नदी बहे, किसी में प्यास ठहरती है।

कोई आँखें गीत लिखें, कोई आँखें मौन कथाएँ,
कोई चेहरा फूल लगे, कोई ढोता बीती छायाएँ।

किसी अधर पर हँसी मिले, किसी पर दर्द ठहरा है,
किसी रूप में पूरा आकाश, किसी में टूटा पहरा है।

रेखाएँ केवल रेखाएँ नहीं, समय की गवाही हैं,
हर सिलवट में छिपी हुई, बीते कल की स्याही है।

किसी आकृति में प्रेम मिला, किसी में विरह की रात,
किसी चेहरे ने कह दी सारी, बिना कहे ही बात।

रंग बदलते, रूप बदलते, मौसम जैसे ढलते हैं,
कुछ चेहरे फिर भी स्मृति में, दीप बनकर जलते हैं।

देह की सीमा मिट जाएगी, रेखाएँ धुंधली होंगी,
पर जिनसे मन जुड़ जाता है, उनकी छवियाँ कहाँ सोती हैं।

आकृति अंततः रूप नहीं, एक अनुभूति बन जाती है,
दिखते दिखते आँखों से वह, स्मृति में उतर जाती है।

शायद सुंदर वही आकृति, जो मन को छूकर ठहर जाए,
और दूर चली जाए फिर भी, भीतर अपना घर बनाए!!


 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
34 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर