क्या दोष था उन सौ से ज़्यादा पौधों का,
जिन्हें तुमने जड़ से मिटा दिया?
सुबह की कड़कती ठंड में,
जिन्हें हमने अपने हाथों से लगाया था,
उन्हीं पौधों को तुमने ट्रैक्टर से मिटवा दिया।
वो सुबह भी क्या खूब हुआ करती थी,
ठंड इतनी कि हाथ तक ठिठुर जाते थे,
तभी फोन पर एक आवाज़ आती थी—
“उठ गए रवि?”
मैं कहता— “हाँ सर…”
फिर आवाज़ आती—
“बाकी लोगों को भी उठाओ।”
दो-चार लोगों की छोटी-सी टीम थी,
किसी के हाथ में पौधा होता,
तो कोई पानी लेकर खड़ा रहता था।
कोई मिट्टी में पौधा लगाता,
कोई उसे पानी डालता,
और उस छोटी-सी मेहनत में
हम सबको बहुत खुशी मिलती थी।
हमें क्या पता था,
जिस हरियाली को हमने उम्मीद समझकर लगाया है,
किसी दिन वही किसी की दुश्मनी की भेंट चढ़ जाएगी।
जब ट्रैक्टर की आवाज़ गूँज रही थी,
जब एक-एक पौधा मिट्टी में मिल रहा था,
क्या उस शोर से तुम्हारा ज़मीर नहीं कचोटा ?
वो पौधे सिर्फ पौधे नहीं थे,
वो आने वाले कल की साँस थे,
वो शुद्ध हवा की उम्मीद थे,
वो किसी राहगीर की छाँव थे,
वो किसी बच्चे के भविष्य का सपना थे।
हर इंसान चाहता है
कि उसके आसपास हरियाली रहे,
पेड़ों की छाँव हो,
साँसों में शुद्ध हवा हो—
फिर उस हरियाली को मिटाने की
दुश्मनी आखिर कैसी?
इंसान होकर इंसानियत को मिटा दिया,
पढ़े-लिखे होकर प्रकृति को भुला दिया।
यह किसी इंसान का काम नहीं,
यह तो हैवानियत की निशानी है।
याद रखना—
मिट्टी में दबे वो पौधे
सिर्फ लकड़ी बनने वाले पेड़ नहीं थे,
वो हमारी मेहनत थे,
हमारी उम्मीद थे,
हमारे सपने थे।
तुमने पौधे मिटा दिए,
मगर हमारी उम्मीद नहीं मिटा सके।
हर मिटे हुए पौधे के साथ
हमारे दिल में एक सवाल रह गया—
आखिर क्या दोष था उन पौधों का,
जिन्हें तुमने मिटा दिया
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