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वर्षा आगमन

                
                                                         
                            बारिश की पहली बूँद
                                                                 
                            
कैलाश में चमक उठी,
मिट्टी भीगने को उतावली हो उठी।
कभी लहरें भी पुकारा करती थीं,
अब यह बिजली कह उठी।

चलो खेतों की ओर,
कि फ़सल मचल उठी।
किसान की आस जागी
और झरने तड़प उठी।

मोर थिरक उठा,
कौतूहल ही कौतूहल समाँ में छा गया।
दरकार जल की जाग उठी,
कदम अग्रसर हुए उन्नति की ओर,
और समय चीख उठी!
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3 महीने पहले

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