किताबें बहुत पढ़ लीं, हम रातों को जागे,
मगर ये मेरी आदतें, क्यों तेरे ही पीछे भागें?
मिटा दी हैं हाथों की रेखाएं भी जलती आग पर,
ये कमबख्त नींद मगर, बस रातों को ही जागे।
वो उम्मीद से रोज़ आती है सुबह अपनी छत पर,
पर अम्मा ने उसकी आकर, दिल के सब धागे तोड़े।
मैं डाकिया भी बनने को तैयार हूँ तेरे प्यार में,
कि हर ख़त का रास्ता, अब बस तेरे घर की ओर भागे।
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