हर मंच से केवल भाषण हैं,
काम नहीं, बस आश्वासन हैं।
झूठे वादों की गूंज बड़ी,
हक़ की बातें सब मौन खड़ी।
रोज़गार कहाँ, बस घोषणाएँ,
आँखों में धूल, बस योजनाएँ।
किसान करे अब आत्महत्या,
अपने 'मद' में चूर पडी़ है सत्ता।
गाँव बिन बिजली के जलते,
शहरों में महल है पलते।
शिक्षा बिके, इलाज महँगा,
गरीब मरें, अमीर कहकहा।
लोकतंत्र के नाम पे होता तमाशा,
जैसे सियासत करके बैठ गई नशा।
पैसे से वोट खरीदे जाते,
ईमानदार पीछे धकेले जाते।
जो बोले सच, वो देशद्रोही,
सवाल उठाए, तो वो लोभी।
अंधभक्ति की होड़ है चलती,
हर सोच यहाँ पहरे में पलती।
अब वक्त है फिर से जाग जाने का,
सत्ता को सच का आईना दिखाने का।
अब कलम उठे, और जुबाँ भी बोले।
देश के बच्चे, बूढ़े और जवां भी बोले।
इंकलाब जिंदाबाद, जय जवान जय किसान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X