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अंतिम श्वास

                
                                                         
                            हुआ अत्याचार लूटी गई इज्जत
                                                                 
                            
किया उस कसौटी पे खरा जहाँ बंजर है जमीन
चीखता बिलखता हुआ शरीर तोरता हर नज्म को
थामने को अपनी अंतिम श्वास
निकलना चाहता है जैसे अँधेरे से उजोर की ओर
और पा लेना चाहते हो वो आसमान जो गले लगाता है उन स्वतंत्रता पक्षियों को हर दिन
मेहसूस करना चाहता है प्रकृति का वो गीत जो शायद भुला दे वो
सौदेबाज़ी
जिसे किया है अपनो ने उसके साथ
पार करना चाहता है धोखेबाजी का वो रिश्ता जिसने नोचा है
उसके पैरों का मांस उसे अपाहिज बनाने केलिए....
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एक दिन पहले

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