कालजयी रचनाएँ कैसे बनती हैं,
जो सार्वकालिक हों, सार्वभौमिक हों।
मुझे उसी की तलाश है,
कहाँ ढूँढूँ, कोई तो हिंट मिल जाए…
एक दिन मैं यही सवाल लेकर,
शब्दों के पुराने जंगल में निकल पड़ा।
रास्ते में एक बूढ़ा बरगद मिला।
मैंने पूछा…
"बताइए, ऐसी रचना कहाँ मिलती है,
जिसे सदियाँ पढ़ें और कभी पुरानी न लगे?"
बरगद मुस्कुराया और बोला…
"मेरी उम्र मत देखो,
मेरी जड़ों को देखो।
जो जितना गहरा उतरता है,
वो उतना ही लंबा जीता है।"
मैं आगे बढ़ा।
एक नदी मिली,
हज़ारों वर्षों से बह रही थी।
मैंने वही सवाल उससे भी किया।
नदी ने कहा…
"जो सिर्फ़ अपने किनारों की कहानी लिखेगा,
वो एक दिन सूख जाएगा।
जो हर प्यासे की प्यास समझ लेगा,
वही समुद्र तक पहुँचेगा।"
थोड़ी दूर एक कुम्हार
मिट्टी को आकार दे रहा था।
मैंने पूछा…
"तुम्हारे हाथों में ऐसा क्या है?"
वो हँसा और बोला…
"हाथों में कुछ नहीं,
धैर्य में सब कुछ है।
जो रचना जल्दी जन्म ले ले,
वो अक्सर जल्दी भुला भी दी जाती है।"
इतने में एक बच्चा आया।
उसने कोई किताब नहीं पढ़ी थी,
फिर भी वो तितली देखकर मुस्कुरा दिया।
मैं समझ गया…
सार्वभौमिकता वहीं जन्म लेती है,
जहाँ अनुभव को भाषा की ज़रूरत नहीं पड़ती।
शाम ढलने लगी।
मैं खाली हाथ लौट रहा था।
तभी पीछे से एक बूढ़े लेखक ने आवाज़ दी…
"क्या ढूँढ रहे हो?"
मैंने कहा…
"कालजयी रचना का रहस्य।"
वो मुस्कुराया और बोला…
"कालजयी रचनाएँ,
अलमारी में नहीं मिलतीं,
न पुरस्कारों के मंच पर,
न तालियों की गूँज में।
उन्हें लिखने से पहले,
जीना पड़ता है।
अपने आँसुओं को भी पढ़ना पड़ता है,
दूसरों की मुस्कानों को भी।
राजा के भीतर छिपे भय को,
भिखारी के भीतर छिपे स्वाभिमान को,
माँ की प्रतीक्षा को,
बच्चे की जिज्ञासा को,
प्रेमी की बेचैनी को,
और मृत्यु के सामने खड़े मनुष्य की निस्तब्धता को,
एक साथ महसूस करना पड़ता है।"
मैंने पूछा…
"तो फिर पहला संकेत क्या है?"
उन्होंने मेरी डायरी बंद करते हुए कहा…
"समय की खबरें मत लिखो,
समय का स्वभाव लिखो।
किसी व्यक्ति की कहानी मत लिखो,
मनुष्य की कहानी लिखो।
किसी एक देश का दर्द मत लिखो,
दर्द का चरित्र लिखो।
जिस दिन तुम्हारे पात्रों में पूरा मानव-हृदय धड़कने लगेगा,
उस दिन तुम्हारी रचना तुम्हारी नहीं रहेगी…
वो युगों की अमानत बन जाएगी।"
और उस रात मुझे पहला हिंट मिल गया…
कालजयी रचनाएँ शब्दों से नहीं बनतीं,
वे सत्य, करुणा, संघर्ष, प्रेम और मनुष्य की अनंत जिज्ञासा के ऐसे संगम से जन्म लेती हैं,
जिसमें हर युग का पाठक अपना ही चेहरा देख सके।
-रतन कुमार कैथवास
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