फिजिक्स भी क्या अजीब चीज़ है यार,
कार चलाता कोई है,
और स्पीड हमसे पूछी जाती है।
मैंने यही बात,
अपने पुराने फिजिक्स के मास्टर साहब से कही।
वो मुस्कुराए नहीं,
बस जेब से चॉक निकाली,
और ब्लैकबोर्ड पर,
एक सीधी-सी रेखा खींच दी।
बोले…
"बुरा लग रहा है?"
मैंने कहा…
"बहुत।
गलती ड्राइवर की,
और जवाब मुझसे!"
उन्होंने चॉक मेज़ पर रखी,
फिर बोले…
"ज़िंदगी भी तो यही करती है।
हालात कोई और बनाता है,
लेकिन उनसे निपटने का हिसाब,
तुमसे माँगती है।"
मैंने कहा…
"ये तो नाइंसाफ़ी है।"
वो हँस पड़े।
बोले…
"नाइंसाफ़ी नहीं,
ज़िम्मेदारी है।"
मैं अब भी नहीं समझा।
उन्होंने एक और सवाल पूछा…
"अगर कार खाई की तरफ़ जा रही हो,
तो तुम क्या करोगे?"
मैंने कहा…
"ड्राइवर को रोकूँगा।"
उन्होंने पूछा…
"और अगर वो न रुके?"
मैं बोला…
"तो जितना हो सके,
ख़ुद को बचाने की कोशिश करूँगा।"
उन्होंने मेरी आँखों में देखा,
और कहा,
"बस…
यही फिजिक्स है,
और यही ज़िंदगी भी।
हर सवाल में,
तुम्हारा दोष नहीं पूछा जाता,
कई बार,
तुम्हारी समझ पूछी जाती है।"
मैं कुछ देर तक,
उनकी बात सोचता रहा।
उन्होंने आख़िर में,
एक ऐसी बात कही,
जो आज तक याद है…
"परीक्षा में,
स्पीड इसलिए तुमसे पूछी जाती है,
क्योंकि उत्तर देने वाला वही होता है
जो स्थिति को समझ सकता है।
ड्राइवर नहीं,
पर्यवेक्षक भी विज्ञान का हिस्सा होता है।"
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"मतलब...
ज़िंदगी के सारे सवाल
मेरे किए हुए नहीं होंगे?"
उन्होंने कहा…
"बिलकुल नहीं।
लेकिन बहुत-से जवाब
तुम्हें ही देने होंगे।"
उस दिन समझ आया,
शिकायत करना आसान है,
समझना थोड़ा मुश्किल।
और शायद इसलिए,
ज़िंदगी हर मोड़ पर पूछती है…
"कार कौन चला रहा था?" नहीं,
"तुमने उससे क्या सीखा?"
क्योंकि इंसान की पहचान,
उससे कम होती है, कि उसके साथ क्या हुआ,
और उससे ज़्यादा होती है,
कि उसने उसके बाद,
क्या समझा, क्या बदला,
और कितनी दूर तक,
मुस्कुराते हुए चलता रहा।
-रतन कुमार कैथवास
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