प्रजातंत्र का महामहोत्सव, छप्पन विध पकवान,
जिनके मुँह में कौर पनीर का, उनको कलकतिया पान।
भूखे पेटों की बस्ती में, भाषण का जलपान,
महलों में उत्सव की रौनक, झोपड़ियों में श्मशान।
वोट माँगने आए हैं फिर, लेकर नए बयान,
वादों की थाली में परसें, सपनों का पकवान।
किसके हिस्से धूप लिखी है, किसके हिस्से छाँव,
काग़ज़ पर खुशहाल देश है, उजड़े खेत-खलिहान।
जनता के हिस्से में ठोकर, सत्ता के जयगान,
कुर्सी पाने की ख़ातिर सब, बन जाते इंसान।
किसान खड़ा है खेतों में, लेकर सूखे अरमान,
मंचों पर खेती की चर्चा, नेताओं का सम्मान।
लोकतंत्र की आत्मा पूछे, कहाँ गया ईमान,
किसकी थाली भरती जाती, किसका खाली थाल?
जब तक भूखे पेटों को भी, मिलता नहीं सम्मान,
कैसा ये महामहोत्सव है, कैसा ये प्रजातंत्र महान?
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X