वो हर सुबह,
दीवार के उसी कोने में जाकर बैठती है,
जहाँ धूप कभी आती ही नहीं,
फिर भी चेहरा ऐसे मोड़ लेती है
जैसे बाहर कोई पेड़ हिल रहा हो।
मैंने एक दिन पूछा,
"यहाँ तो कुछ दिखाई भी नहीं देता,
फिर रोज़ यहीं क्यों बैठती हो?"
वो हल्का-सा हँसी,
और बोली…
"आदतें हमेशा, जगहों की मोहताज नहीं होतीं,
कभी-कभी उम्मीद ही,
खिड़की बन जाती है।"
बचपन में उसके घर की,
एक छोटी-सी खिड़की थी,
जहाँ से आसमान का बस,
एक टुकड़ा दिखाई देता था।
उसी टुकड़े में,
उसने मौसम बदलते देखे थे,
चिड़ियों को लौटते देखा था,
बारिश की पहली बूँद को,
हथेली पर उतरते देखा था।
फिर ज़िंदगी ने,
उसे बड़े घर तो दिए,
मगर ऐसी दीवारें भी दीं,
जिनमें कोई खिड़की नहीं थी।
अब जब भी,
हवा की आवाज़ सुनती है,
आँखें अपने आप,
किसी अनदेखी, चौखट को खोजने लगती हैं।
लोग कहते हैं…
"इतनी-सी बात पर, उदास क्यों हो जाती हो?"
उन्हें कौन समझाए,
कुछ लोग रोशनी के लिए नहीं,
रास्ते के एहसास के लिए,
खिड़की चाहते हैं।
क्योंकि खिड़की सिर्फ़ ईंटों के बीच बना, एक छेद नहीं होती,
वो इस बात का सबूत होती है,
कि हर बंद कमरे के बाहर,
अब भी एक दुनिया बाकी है।
तुम उसे कैसे समझ सकते हो,
जिसे खिड़की के पास बैठना पसंद हो,
और उसके कमरे में,
एक खिड़की भी न हो।
-रतन कुमार कैथवास
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