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उनके मुख में चिंगम,डालोगे कब तक

                
                                                         
                            सीने में चिंगारी लेकर, कहाँ तलक तू भागेगा,
                                                                 
                            
अपने ही अंतर्मन से, कब तक आँख चुराएगा।
सूरज को ललकारे क्यों, शीतलहर में अकड़े क्यों,
जब ख़ुद की बारी आए तो फिर क़दम पीछे हटाए क्यों?

मन में इतने दीप पड़े हैं, तेल और बाती भी डालो,
अँधियारे को कोसने से पहले, अपनी लौ को आग दिखा दो।
कब तक दूसरों के हिस्से का उजियारा माँगोगे,
अपने भीतर आग हो तो, फिर मशाल जलाने से क्या भागोगे?

बच्चे तेरी बातों को, आख़िर आँख मूँदकर मानें क्यों,
ख़ुद ही राह भटकते हो, तो तुझको अपना आदर्श जानें क्यों।
उपदेशों की गठरी लेकर, दुनिया भर में घूमते हो,
अपने कर्मों का हिसाब आए, तो चुप्पी साधे रहते हो क्यों?

फुसलाकर उनके मुख में चिंगम, डालोगे कब तक,
झूठे वादों से, उनके सवाल टालोगे कब तक।
बच्चों को सपने देकर, उनके पंख मत काटो तुम,
सच की राह दिखानी है तो, पहले सच को समझाओ तुम।

अब तो अपने आचरण से, हर प्रश्न का उत्तर देना,
दीप बनो, अँधियारे में बस उजियारा भरते रहना।
सीने की चिंगारी को, जनहित की मशाल बनाना,
बच्चों को केवल बहलाना नहीं, सच के साथ चलना सिखाना।
-रतन कुमार कैथवास
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54 मिनट पहले

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