तुम ऐसा क्यों कहती थी कि...
"हर मुलाक़ात का अंजाम,
हमेशा साथ होना नहीं होता।"
तब तुम्हारी बात,
सिर्फ़ एक जुमला लगी थी,
आज वही ज़िंदगी का,
सबसे सच्चा फ़लसफ़ा लगती है।
तुम ऐसा क्यों कहती थी कि...
"कुछ लोग किस्मत में नहीं,
बस किरदार में लिखे जाते हैं।"
मैं हर बार मुस्कुरा देता था,
सोचता था…
मोहब्बत जहाँ होती है,
वहाँ जुदाई कैसी?
लेकिन वक़्त ने,
तुम्हारी हर बात का,
मतलब समझा दिया।
तुम ऐसा क्यों कहती थी कि...
"रिश्ते आवाज़ से नहीं,
अहसास से चलते हैं।"
अब जब तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती,
तब भी,
कई बार लगता है,
तुमने अभी-अभी,
मेरा नाम लिया है।
तुम ऐसा क्यों कहती थी कि...
"जिसे सचमुच अपना कहना हो,
उसे बाँधना मत।"
तब मैं समझ नहीं पाया था,
आज परिंदों को उड़ते देखता हूँ,
तो तुम्हारी बात याद आती है।
तुम ऐसा क्यों कहती थी कि...
"एक दिन मेरी बातें,
तुम्हें, मेरी गैरमौजूदगी में समझ आएँगी।"
देखो...
तुम फिर सही निकली।
अब हर मोड़ पर,
तुम्हारे कहे हुए लफ़्ज़ मिल जाते हैं,
लेकिन तुम नहीं मिलती।
शायद इसलिए,
कुछ लोग चले जाने के बाद भी,
ख़त्म नहीं होते...
वे सवाल बनकर,
उम्र भर हमारे साथ चलते रहते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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