सफ़ेद बर्फ़ से ढकी सरहद,
मुझको बहुत लुभाती है,
दूर पहाड़ों की ख़ामोशी,
देशप्रेम के गीत सुनाती है।
मन करता है वर्दी पहनकर,
मैं भी एक सिपाही बन जाऊँ,
मातृभूमि की रक्षा ख़ातिर,
सरहद पर पहरा देने जाऊँ।
जब दुनिया रज़ाई में सोए,
मैं बर्फ़ीली रात बिताऊँ,
ठिठुरती हवाओं के आगे,
सीना तानकर खड़ा रह जाऊँ।
पाँव तले बर्फ़ की चादर,
सिर पर खुला आसमान रहे,
मेरी साँसों में देश बसे,
दिल में हिंदुस्तान रहे।
माँ जब मेरे माथे पर,
तिलक लगाकर मुझे विदा करे,
आँखों में आँसू हों फिर भी,
हँसकर मेरा हौसला बढ़ाए।
कह दे, “बेटा, फ़र्ज़ निभाना,
देश का मान न झुकने देना,”
मैं भी उसके चरण छूकर कह दूँ,
“माँ, अपना विश्वास न टूटने देना।”
न महलों की चाहत मुझको,
न शोहरत का कोई अरमान,
मेरी वर्दी मेरा गौरव,
मेरा तिरंगा मेरी शान।
जहाँ तिरंगे की आन पर,
कोई आँच कभी आ जाए,
मेरा हर क़दम आगे बढ़कर,
अपना फ़र्ज़ निभाए।
कभी बर्फ़ीली चोटियों पर,
कभी तपते रेगिस्तान में,
कभी घने जंगलों के बीच,
कभी दुश्मन के मैदान में।
हर मौसम में डटा रहूँ मैं,
भारत माँ की ढाल बनकर,
मेरी पहचान यही हो जाए,
जिऊँ वतन के नाम पर, और
अमर हो जाऊँ तिरंगे का मान बनकर।
-रतन कुमार कैथवास
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