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तेरी खबर लेकर ये दिशाएं आईं

                
                                                         
                            मेरे मजरे की तुलसी मत उखाड़,
                                                                 
                            
तेरे आने की खबर ले के हवाएँ आईं।

आँगन सूना था, मगर दीप जला बैठा,
तेरी आहट की उम्मीदें कई रातों से आईं।

नीम की छाँव ने पूछा है तेरा हाल मुझसे,
तेरी यादों की महक ले के घटाएँ आईं।

जिस डगर पर तेरे पाँवों के निशाँ मिलते थे,
आज उसी राह पे फिर कुछ सदाएँ आईं।

मैंने चौखट पे अभी दीप बुझाया भी नहीं,
तेरे लौटने की खबर ले के दिशाएँ आईं।

मत छेड़ो इन पुराने से निशानों को ज़रा,
इनमें बीते हुए मौसम की दुआएँ आईं।

मेरे मजरे की ये मिट्टी भी तुझे पहचानती है,
तेरे नामों की कई बार यहाँ हवाएँ आईं।
-रतन कुमार कैथवास
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2 घंटे पहले

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