आज शाम से ही हिचकी आ रही है,
लगता है वो तकलीफ़ में है।
हवा ने भी आज कुछ अलग-सी ख़बर सुनाई,
खिड़की पर बैठी चिड़िया देर तलक चुप रही।
दिल ने जाने क्यों एक ही नाम पुकारा,
और साँसों की रफ़्तार भी कुछ थम-सी गई।
मैंने ख़ुद को समझाया…
"हिचकियाँ तो यूँ ही आ जाती हैं,
हर एहसास का कोई रिश्ता नहीं होता।"
मगर दिल कहाँ तर्क मानता है,
वो तो हर धड़कन में एक कहानी ढूँढ़ लेता है।
याद आया,
एक बार उसने हँसकर कहा था…
"कभी अचानक मेरी याद आए,
तो समझ लेना मैं भी तुम्हें याद कर रही हूँ।"
शायद वही अधूरी बात,
आज फिर कानों में उतर आई थी।
मैं छत पर गया,
आसमान वैसा ही था,
चाँद अपनी जगह पर,
सितारे भी मुस्कुरा रहे थे।
बस मेरे भीतर,
एक बेचैन दरिया बह रहा था।
मैंने दुआ में उसके लिए,
कोई बड़ी चीज़ नहीं माँगी,
बस इतना कहा…
"ऐ ख़ुदा, अगर सचमुच वो किसी मुश्किल में है,
तो उसका दर्द मेरे हिस्से लिख दे,
और उसके चेहरे की मुस्कान लौटा दे।"
रात और गहरी हुई,
हिचकियाँ भी धीरे-धीरे थम गईं।
तब समझ आया,
कई बार तकलीफ़ सामने वाले को नहीं,
अपने ही दिल को होती है,
जो किसी अपने की, फ़िक्र में ख़ामोश रहता है।
आज शाम से ही हिचकी आ रही है,
लगता है वो तकलीफ़ में है।
या शायद…
तकलीफ़ उसे नहीं,
उसकी याद को भूल न पाने वाले,
इस दिल में है।
-रतन कुमार कैथवास
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