दोस्ती हमेशा रेडीमेड नहीं होती,
उसे टेलरमेड बनाना पड़ता है।
हर इंसान का नाप अलग होता है,
किसी को ख़ामोशी रास आती है,
तो किसी को देर रात तक ढेर सारी बातें।
एक ही रिश्ता,
सब पर एक जैसा नहीं जँचता।
दोस्ती का दर्ज़ी,
कैंची से कम,
सब्र के धागे से ज़्यादा काम लेता है।
हर ग़लतफ़हमी की सिलवट,
सुई की नोक से सीधी करता है।
जो पहली नाराज़गी पर,
रिश्ते उतारकर टाँग देते हैं,
उन्हें दोस्त नहीं,
केवल मौसम मिलते हैं।
सच्चा दोस्त,
कपड़े का रंग नहीं देखता,
चरित्र का कपड़ा टटोलता है।
उसे मालूम होता है,
कि वक़्त के साथ जिस कपड़े की सिलाई मज़बूत हो,
वही उम्र भर साथ निभाता है।
मैंने देखा है…
कुछ लोग रिश्तों की दुकान में,
तुरंत फिट होने वाले दोस्त खोजते हैं,
फिर शिकायत करते हैं,
कि साथ ज़्यादा दिन चला नहीं।
उन्हें कौन समझाए,
दोस्ती बाज़ार की चीज़ नहीं,
कारीगरी का हुनर है।
हर विश्वास की गाँठ,
हाथ से बाँधनी पड़ती है,
हर अपनापन,
दिल से नापना पड़ता है।
इसलिए आज भी कहता हूँ…
दोस्ती हमेशा रेडीमेड नहीं होती,
उसे टेलरमेड बनाना पड़ता है।
क्योंकि जिस रिश्ते की सिलाई,
ईमानदारी के धागे से हुई हो,
उसे वक़्त की कोई कैंची,
आसानी से उधेड़ नहीं पाती।
-रतन कुमार कैथवास
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